डॉ. सुप्रिया पट्टेरी को साहित्यिक सम्मान और उनकी पुस्तक ‘हरित संवाद’ का विमोचन

               

दिनांक 21 नवंबर 2025, केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय का हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग अपनी अकादमिक उत्कृष्टता और शोधपरक वातावरण के लिए निरंतर प्रतिबद्ध रहा है। इसी कड़ी में विभाग के लिए वर्तमान समय अत्यंत गौरव और हर्ष का विषय बन गया है। विभाग की सहायक आचार्या डॉ. सुप्रिया पट्टेरी ने अपनी बहुआयामी प्रतिभा से न केवल विश्वविद्यालय का मान बढ़ाया है बल्कि अपनी एक विशिष्ट पहचान भी अंकित की है।

        रचनात्मक लेखन और अकादमिक अनुसंधान के क्षेत्र में डॉ. सुप्रिया के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित किया गया है। साहित्य के प्रचार-प्रसार और सृजनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने वाली अग्रणी संस्था ऑल इंडिया पोएटस कॉन्फ्रेंस’ (All India Poetess Conference) ने उनके कार्यों को मान्यता देते हुए 21-22-23 नवम्बर 2025 को ए.आई.पी.सी. के रजत जयंती के अवसर पर गुवाहाटी, असम में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें प्रतिष्ठित कौड़े आंडाल पुरस्कार(Kaude Andal Award) से सम्मानित किया है।

                     

        सम्मान की इस उपलब्धि के साथ-साथ अकादमिक जगत के लिए एक और महत्वपूर्ण घटना डॉ. सुप्रिया पट्टेरी द्वारा संपादित पुस्तक हरित संवाद: साहित्य, सिनेमा एवं समाजका विमोचन रही। आज के दौर में जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे समय में साहित्य और कला का दायित्व और भी बढ़ जाता है। डॉ. सुप्रिया ने इस नब्ज को पहचाना और हरित संवादके रूप में एक ऐसा ग्रंथ समाज को सौंपा जो समय की मांग है। हरित संवादका विमोचन एक भव्य समारोह में किया गया, जहाँ नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (NEHU) के कुलपति प्रो. प्रभा शंकर शुक्ल, एआईपीसी के संस्थापक प्रो. लारी आज़ाद और कई गणमान्य विद्वजनों ने पुस्तक का विमोचन कर मंच की गरिमा बढ़ाई। इस पुस्तक की महत्ता इस बात से भी सिद्ध होती है कि इसकी भूमिका, ‘साहित्य का पारिस्थितिक दर्शन और इको-फेमिनिज़्मजैसी प्रसिद्ध पुस्तकें लिखने वाली लेखिका व आलोचक के. वनजा द्वारा लिखी गई है। के. वनजा का नाम साहित्य जगत में बड़े आदर के साथ लिया जाता है और उनके द्वारा इस पुस्तक की भूमिका लिखा जाना यह प्रमाणित करता है कि हरित संवादएक गंभीर और संग्रहणीय कृति है। यह पुस्तक हिंदी साहित्य में पर्यावरण विमर्श(Ecocriticism) को एक नई दिशा देने का प्रयास करती है। इसमें संकलित लेख और शोध-पत्र पाठकों को यह सोचने पर विवश करते हैं कि विकास की अंधी दौड़ में हमने प्रकृति के साथ जो संवाद खो दिया है, उसे साहित्य और सिनेमा के माध्यम से कैसे पुनर्जीवित किया जा सकता है।

डॉ. सुप्रिया पी. की यह उपलब्धि छात्राओं और शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। विशेष रूप से एक ऐसे क्षेत्र में जहाँ वे अध्यापन कर रही हैं, वहाँ शोध और सृजन का ऐसा सामंजस्य स्थापित करना अनुकरणीय है। कौड़े आंडाल पुरस्कारप्राप्त करना उनकी सृजनात्मक क्षमता का परिचायक है तो हरित संवादका प्रकाशन उनकी अकादमिक और संपादकीय दक्षता का प्रमाण है। यह पुस्तक इस बात का भी संकेत है कि हिंदी विभाग अब केवल पारंपरिक साहित्य तक सीमित नहीं है बल्कि वह सिनेमा और पर्यावरण जैसे आधुनिक और प्रासंगिक विषयों पर भी अधिकारपूर्वक विमर्श कर रहा है।

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