‘समकालीन भारतीय साहित्य और गांधी दर्शन’ (राष्ट्रीय संगोष्ठी)
दिनांक 08-09 फरवरी 2018 को हिन्दी विभाग द्वारा संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त निकाय गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के अनुदान से ‘समकालीन भारतीय साहित्य और गांधी दर्शन’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में कालीकट विश्वविद्यालय के गांधी अध्ययन एवं अनुसंधान पीठ का अकादमिक सहयोग रहा। संगोष्ठी का उद्देश्य छात्रों को गांधी के विचारों से परिचित करवाना, गांधीजी की विचारधारा से परिचय प्राप्त कर उ सको आत्मसात करना तथा उनको अपना संस्कार बना लेना था ताकि सभी छात्र आने वाले समय में बेहतर इंसान बन कर निकले और समाज को कुछ दे सके, सिखा सकें। संगोष्ठी में अतिथियों का स्वागत करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. सुधा बालकृष्णन ने कहा कि भारतीय साहित्य से जुड़े प्रश्नों को गांधी दर्शन के परिप्रेक्ष्य में देखना बहुत आवश्यक है। संगोष्ठी का उद्घाटन माननीय प्रभारी कुलपति महोदय प्रो. (डॉ. ) के. पी. सुरेश ने अपने उद्घाटन भाषण में गांधी जी के महत्त्व को बताते हुए गांधी को ‘मोस्ट इंप्वारटेंट पर्सानाल्टी’ बताया और साथ ही गांधीजी के विचारों को सभी भाषाओं में अनुदित करने का आग्रह किया। कालिकट विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. आर. सुरेन्द्रन ने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की तरफ से की जाने वाली पहलों का जिक्र करते हुए बताया कि अगले साल बा - बापू की 15वीं सालगिरह है, जिसके उपलक्ष्य में केन्द्रीय साहित्य समिति के द्वारा सभी भाषाओं में मौजूद गांधी साहित्य का हिंदी में अनुवाद होगा जो कि हिंदी जाति और जनसमूह के लिए महत्वपूर्ण कार्य होगा। गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों में उनके सहयोगी रहे गांधी अनुयायी वी. पी. अप्पुकुट्टन पोदुवाल ने गांधीजी से हुई अपनी भेंट को याद करते हुए यह बताया कि अगर हम चाहे तो गांधी दर्शन के माध्यम से सभी समस्याओं को हल कर सकते हैं। इसके बाद प्रो. आर. सुरेन्द्रन की पुस्तक ‘अनुवाद: कुछ नमूने कुछ पैमाने’ का विमोचन प्रभारी कुलपति महोदय के कर-कमलों द्वारा संपन्न हुआ। बीज वक्तव्य में महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व उप-कुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन ने कहा कि विचारमय भविष्य के लिए गांधी सबसे अधिक प्रासंगिक हैं। आज के दौर में सुख तथा संतुष्टि के लिए गांधी मार्ग से होकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने गांधी को सुकरात और बुद्ध की परंपरा से जोड़ते हुए गांधी की विचारधारा से ओत प्रोत मलयालम कविताओं का जिक्र किया। साथ ही मुक्तिबोध के साहित्य में किस तरह गांधी आते हैं, उसका जिक्र करते हुए बताया कि हर विचारक किस तरह गांधी जी से अपने लिए विचार ग्रहण करता है। सत्र का संचालन विभागीय शोध छात्रा दीक्षा सिंह और धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभाग के उपाचार्य डॉ. तारु एस. पवार ने किया। प्रथम अकादमिक सत्र की अध्यक्षता कर रहे महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के हिंदी विभाग के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. सूरज पालीवाल ने बताया कि गांधी कई दृष्टियों से अपरिहार्य हैं। गांधी जी से जुड़े कई संस्मरणों का जिक्र करते हुये आपने बताया कि पूरी दुनिया के आतंकवाद और उग्रवाद का हल केवल गांधी के पास है। इस सत्र के अन्य वक्ता रहे- केरल लोक कला अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद अहमद, श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय की अध्यक्षा प्रो. के. श्रीलता एवं पय्यनूर कालेज के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सिन्धु। इस सत्र का संचालन विभागीय शोध छात्रा सीमा दास और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने किया। द्वितीय अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष प्रो. मंजुनाथ एन. अम्बिग ने दक्षिण में गांधी जी के नेतृत्व में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना से लेकर अब तक के सभा के विकास और गतिविधियों पर प्रकाश डाला। इस सत्र के मुख्य वक्ता थे- महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के शैक्षिक संयोजक एवं उपाचार्य, डॉ. शोभा पालीवाल, श्री के. वी. राघवन (अध्यापक एवं सामाजिक कार्यकर्ता), सरकारी महिला महाविद्यालय, त्रिवेंद्रम की पूर्व आचार्या डॉ. पी. लता, सेक्रेट हार्ट कालेज, तेवरा के हिंदी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. मिनी प्रिया। द्वितीय अकादमिक सत्र का संचालन विभागीय शोध छात्रा दिलना के और धन्यवाद ज्ञापन सहायक आचार्य डॉ. राम बिनोद रे ने किया। तृतीय अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि बड़ा विचार विरोध में ही पनपता है। महात्मा गांधी स्वास्थ्य को कर्म से जोड़कर देखते थे। इस सन्दर्भ में वे गिरिराज किशोर के ‘पहला गिरिमिटिया’ उपन्यास की विशेष चर्चा की। सत्र के अन्य वक्ता कारमेल महाविद्यालय, त्रिसूर के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य एवं अध्यक्ष डॉ. शिबी सी, केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डॉ. चिन्मय विजय थारूरकर एवं केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं राजनीति विभाग के डॉ. लालजी पाल थे। इस सत्र का संचालन विभागीय शोध छात्र संतोष कुमार और धन्यवाद ज्ञापन नवमी एम. ने किया। चतुर्थ अकादमिक सत्र के अध्यक्ष गांधी स्मृति दर्शन समिति के प्रतिनिधि एवं कालिकट विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष प्रो. आर. सुरेन्द्रन रहे। प्रो. सुरेन्द्रन ने कहा कि गांधी जी की सबसे बड़ी ताकत उनका विवेक था। इस सत्र के अन्य वक्ता सी के जी एम सरकारी कालेज, कोषिक्कोड के हिंदी विभाग की सहायक आचार्या डॉ. प्रिया पी., केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के अंग्रेजी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग के सहायक आचार्य डॉ. इफ्तिकर अहमद थे। चतुर्थ सत्र का संचालन विभागीय शोध छात्र राम यशपाल और धन्यवाद ज्ञापन हेमंत कुमार ने किया। अन्तिम अकादमिक सत्र के अध्यक्ष महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के शैक्षिक संयोजक एवं उपाचार्य, डॉ. शोभा पालीवाल रही। उन्होंने पुनः गांधी जी के विचारधारा के महत्व को रेखांकित किया। केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग के शोध छात्रा दिलना के, नवमी एम, सीमा दास एवं एम. ए. की छात्रा सौपर्णिका ने इस स्तर में प्रपत्र वाचन किया और युवा पीढ़ी की सोच को मंच पर आने का मौका मिला। इस सत्र का संचालन विभागीय शोध छात्रा प्रिया राणा और धन्यवाद ज्ञापन वृन्दा एम. ने किया। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. सुधा बालकृष्णन ने संगोष्ठी की सार्थकता और महत्त्व को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भाषा-विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. पलनिराजन समापन सत्र के विशिष्ट अतिथि रहे और डॉ. आर. सुरेन्द्रन ने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति का प्रतिनिधित्व करते हुए मुख्य वक्तव्य दिया। केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शोध छात्र प्रभांशु शुक्ल ने दो दिन की संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी की संयोजिका एवं हिंदी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. सुप्रिया पी ने समापन सत्र में धन्यवाद ज्ञापन किया। सत्र का संचालन विभाग के सहायक आचार्य एवं संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने किया।
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