U.G.C. NET /JRF/ PG Curriculuam Based Online Lecture- Development of Theoretical Aspect of Hindi Novel (हिंदी उपन्यास के सैद्धांतिक पक्ष का विकास)



03 फरवरी 2023, हिंदी एवं तुलनात्मक विभाग, केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय में ‘हिंदी उपन्यास के सैद्धांतिक पक्ष का विकास’ (Development of Theoretical Aspect of Hindi Novel) विषय पर एम. ए. / यूजीसी नेट जेआरएफ पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान का अध्यक्षीय उद्बोधन कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. तारु एस. पंवार और स्वागत भाषण संयोजक डॉक्टर धर्मेंद्र प्रताप सिंह के द्वारा दिया गया। व्याख्यान के मुख्य वक्ता के रूप में विद्यान्त हिंदू पीजी कॉलेज, लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रजेश ने हिन्दी उपन्यास के सैद्धांतिक विकास पर अपनी बात रखते हुए कहा कि आज लेखन को कोई स्वतंत्र पेशा के रूप में नहीं अपनाता। प्रत्येक लेखक में उनके अवचेतन में कुछ बातें पड़ी रहती हैं जो सिद्धान्त की निर्मिति में सहायक होती हैं। यदि उपन्यास का कथानक जनमानस के बीच का रहता है तो पाठक रचना से जुड़ाव महसूस करता है। साहित्य में इतिहास का कलात्मक रूप पाया जाता है। प्रकृति की सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं जो कि एक वैज्ञानिक सत्य है। प्रकृति और जीवन के बीच रागात्मक संबंध होता है और इसे किसी रूप में अलग नहीं किया जा सकता। प्रोफेसर ब्रजेश ने उपन्यास की सैद्धांतिकी पर अपनी राय रखते हुए कहा कि हम तत्वों के आधार पर ही इसकी सैद्धांतिकी तय कर सकते हैं। एक कथानक से कई सिद्धांत निकलते हैं। रामायण का कंपोजीशन ऐसा नहीं है कि उसे उपन्यास कहा जा सके। रामायण और उपन्यास की मूलभूत संरचना में अंतर है। शिल्प और भाषा दोनों के स्तर पर विशेष घटना को अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करना ही सिद्धांत का निर्धारक बिंदु बनता है। उन्होंने उपन्यास के तत्व पर बात करते हुए अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत की जाने वाली घटनाओं का उल्लेख करते हुए कथानक के दो रूप प्रस्तुत किए- तथ्यात्मक और निरपेक्षात्मक। पश्चिम में उपन्यास का उदय हुआ और पूंजीवादी संस्कृति का गद्य में रचनात्मक आख्यान उपन्यास के रूप में प्रचलित हुआ। उपन्यास आज के समय में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली विधा है। हिन्दी की अन्य गद्य विधाओं में भी यही सिद्धांत लागू हो सकता है। उन्होंने गोदान को भारत का औपनिवेशिक कांड बताते हुए भारतीय किसानों का सामंती और महाजनी व्यवस्था के अंतर्गत शोषणकारी तत्वों पर प्रकाश डाला। प्रो. ब्रजेश ने गोदान के अतिरिक्त ‘देवरानी जेठानी की कहानी’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘महाभोज’, ‘शेखर एक जीवनी’, ‘आपका बंटी’, ‘गोरा’, ‘रेत समाधि’, ‘वार एंड पीस’ आदि उपन्यासों के आलोक में हिन्दी उपन्यास के सैद्धांतिक पक्ष पर अपने विचार प्रकट किए। व्याख्यान के बाद छात्रों की शंकाओं का समाधान किया गया। व्याख्यान में धन्यवाद ज्ञापन विभाग की सहायक आचार्य और रोजगार प्रकोष्ठ की संयोजिका डॉ. सीमा चंद्रन ने दिया। कार्यक्रम का संचालन एम. ए. तृतीय सेमेस्टर की छात्रा जोसी ने किया। इस अवसर पर विभाग के सहायक आचार्य डॉ. राम बिनोद रे के अतिरिक्त पीएच डी और एम ए के छात्र मौजूद थे। 

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो. तारु एस. पवार

स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते कार्यक्रम के संयोजक डॉ. धर्मेंद्र प्रताप सिंह 

रोजगार प्रकोष्ठ की संयोजिका डॉ. सीमा चंद्रन धन्यवाद देती हुई 
एम ए तृतीय सेमेस्टर की छात्रा जोसी कार्यक्रम का संचालन करती हुई 







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